एक दिन यूहि चलते हुए , ख्याल आया बहुत सुनहरा,
उड़ने की इच्छा हुई , पर ना पंख थे , ना उदंखटोला
हसरतें थी आसमान तक किंतु ज़मीन कैसे छोड़ता
राह में काँटे हज़ार , कदम-कदम बढ़ता रहा
पथ भ्रमित हुआ ज़रूर , पर ठोकर खाना मंजूर था
चंचल हसरतें और उनकी गुदगुदाती ख्वाहिशें,
कुछ इतनी लुभावनी की मन का ठहरना असंभव था.
वक़्त की उस डगमग चाल में , कर्वते लेती भरी दोपेह्रि ,
ना ही शोर , ना कोई छाँव बस बीते पलो का एक झरोखा
भीषण गर्मी से नश्वर शरीर पक चुका था , टांगे मजबूर थी,
पलको के बोझ तले , चला थॅकी आँखों से कुछ खोजता
कुछ मील जाने पर, ना मालूम एक वृक्ष क्यूँ अपना लगा
जाने ही कितने विभिन्न वर्षो से उसने सब कुछ देखा था
अंधकार देखा ,धूप देखी , सूखा देखा , वर्षा देखी
आँधी के थपेड़े सहे , पर अपनी कुछ गज़ ज़मीन पर अडिग था
हर वर्ष चार मौसम आते , और सब ही उससे झेले जाते ,
ना किसीसे शिकायत थी और ना ही कभी कोई दुश्वारी करता.
बावजूद मुश्किलो के, बीज से पौधा बना और फिर विशाल पेड़,
मुसाफिरो को छाया और गिरे फलो से भूख मिटाते बकरी-भेड़
उस अध्बुत छन की बदोलत मुझे उत्तर मिल चुका था
अब मेरी अवास्तविक उड़ानो पर यथार्थ का क़ब्ज़ा था,
पाव मेरे ठहर से गये थे और अंतर्मन था शांत,
ऐसे अनुभूति थी जैसे मेरा था सारा गगन अनंत
सपना बुनना ग़लत नही था , ग़लत था सपने का आकार ,
चलने में समय व्यर्थ ना होता , गर किया होता सही विचार,
उस दिन वह कठोर वृक्ष बहुत सारी सीख दे गया था
और ज़िंदगी के परिपेक्ष में हज़ारो सबक दे गया था
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लेखक- विनय सिंगला
समय - 2 एप्रिल , सन् 2014
